जौनपुर में श्रीराम कथा के सातवें दिन आचार्य शांतनु महाराज ने सुनाए केवट संवाद और चित्रकूट लीला के प्रसंग
जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज परिसर में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के संयोजन में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के सातवें दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु महाराज ने राम वनगमन से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया। केवट के निष्काम प्रेम, महर्षि भारद्वाज और महर्षि वाल्मीकि के मार्गदर्शन तथा चित्रकूट में प्रभु श्रीराम की भावुक लीला का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि भगवान को धन-दौलत या भौतिक वैभव से अधिक भक्त का निर्मल प्रेम प्रिय है। केवट ने अपनी निस्वार्थ भक्ति और समर्पण से प्रभु श्रीराम का मन जीत लिया। केवट संवाद का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि गंगा पार कराने के बाद जब माता सीता ने उतराई देने के लिए अपनी अंगूठी निकालनी चाही, तो केवट ने उसे लेने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।
केवट ने प्रभु श्रीराम से कहा कि एक मल्लाह दूसरे मल्लाह से उतराई नहीं लेता। आपने मुझे गंगा के इस पार से उस पार पहुंचाया है, जब मेरी बारी आए तो आप मुझे संसार रूपी भवसागर से पार उतार दीजिएगा। केवट की इस विनती में छिपी भक्ति और समर्पण ने कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया।
कथाव्यास ने कहा कि सच्ची भक्ति में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता। जब भक्त का हृदय प्रेम, सेवा और समर्पण से भरा होता है, तो भगवान भी उसके प्रेम से बंध जाते हैं। केवट का प्रसंग हमें सिखाता है कि प्रभु की कृपा पाने के लिए धन या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि निर्मल मन और सच्ची श्रद्धा आवश्यक है।
महर्षि भारद्वाज और वाल्मीकि ने दिखाया मार्ग
गंगा पार करने के बाद प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण महर्षि भारद्वाज के आश्रम पहुंचे। वहां उन्होंने महर्षि को प्रणाम कर वनवास के दौरान निवास के लिए उपयुक्त स्थान के बारे में मार्गदर्शन मांगा। महर्षि भारद्वाज ने उनका स्वागत करते हुए आगे की यात्रा के संबंध में जानकारी दी।
इसके बाद प्रभु श्रीराम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचे। महर्षि ने उन्हें चित्रकूट जाने का सुझाव दिया। प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और मंदाकिनी नदी के पवित्र तट के कारण चित्रकूट वनवास के लिए उपयुक्त स्थान था। महर्षि के मार्गदर्शन के बाद प्रभु श्रीराम ने चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया।
चित्रकूट में माता-पिता की याद ने किया भावुक
आचार्य शांतनु महाराज ने चित्रकूट प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि वन की प्राकृतिक छटा और मंदाकिनी नदी के शांत तट पर पहुंचकर प्रभु श्रीराम को अयोध्या तथा अपने माता-पिता की याद सताने लगी। माता कौशल्या के स्नेह और पिता महाराज दशरथ के वात्सल्य को याद कर प्रभु श्रीराम भावुक हो उठे।
इस प्रसंग के माध्यम से कथाव्यास ने कहा कि प्रभु श्रीराम ने अपने आचरण से पुत्र धर्म, पारिवारिक प्रेम, त्याग और मानवीय संवेदनाओं का आदर्श प्रस्तुत किया। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए राजमहल के सुखों का त्याग कर वनवास स्वीकार करना उनके मर्यादित चरित्र की महानता को दर्शाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
कथा में अनेक गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति
श्रीराम कथा के दौरान प्रांत प्रचारक अंगराज सिंह, प्रांत कार्यवाह मुरली पाल, मिर्जापुर के जिला प्रचारक रजत, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष कमला सिंह, कुश्ती महासंघ के उपाध्यक्ष अनिल कुमार शाही, टीडी इंटर कॉलेज के प्रबंधक सत्य प्रकाश सिंह, समाजसेवी जय सिंह अन्ना, भुवनेश्वर सिंह, अमित सिंह बाबी, दीपक सिंह, शिवा सिंह, सुमित सिंह, आशुतोष कुमार बबलू और आलोक सहित अनेक श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

















