जौनपुर। कोरोना महामारी के दौरान मरीजों को निर्बाध ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अमर शहीद उमानाथ सिंह जिला चिकित्सालय में स्थापित ऑक्सीजन प्लांटों की मौजूदा व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि अस्पताल के एक ऑक्सीजन प्लांट के संचालन के लिए अब तक नियमित ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं हुई है और जरूरत पड़ने पर एक वार्ड ब्वाय से इसे संचालित कराया जाता है। वहीं, तत्कालीन सांसद श्याम सिंह यादव की निधि से स्थापित दूसरे ऑक्सीजन प्लांट के अब तक चालू नहीं होने की बात भी सामने आई है।
महामारी के दौरान ऑक्सीजन की किल्लत को देखते हुए जिला अस्पताल में प्रधानमंत्री निधि से एक ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किया गया था। इसके अलावा तत्कालीन सांसद श्याम सिंह यादव की निधि से भी दूसरा प्लांट लगाया गया था। इनका उद्देश्य अस्पताल में भर्ती मरीजों को जरूरत के समय ऑक्सीजन उपलब्ध कराना था। हालांकि, दोनों प्लांटों के संचालन और मौजूदा स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों ने उनकी कार्यप्रणाली और रखरखाव पर ध्यान खींचा है।
नियमित ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं
जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. संजय कन्नौजिया के मुताबिक, आवश्यकता पड़ने पर विभागीय स्तर पर प्रशिक्षित एक वार्ड ब्वाय से ऑक्सीजन प्लांट का संचालन कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि ऑपरेटर की नियुक्ति के संबंध में मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिलाधिकारी को लिखित रूप से अवगत कराया जा चुका है।
ऐसे में सवाल उठता है कि मरीजों के लिए जीवनरक्षक मानी जाने वाली ऑक्सीजन व्यवस्था के संचालन हेतु नियमित तकनीकी कर्मचारी की तैनाती अब तक क्यों नहीं हो सकी। हालांकि, प्लांट के संचालन की तकनीकी स्थिति और उपलब्ध कर्मचारियों के प्रशिक्षण की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
सांसद निधि से स्थापित प्लांट हैंडओवर नहीं होने की बात
दूसरे ऑक्सीजन प्लांट के संबंध में सीएमएस डॉ. संजय कन्नौजिया ने कहा कि यह प्लांट उन्हें हैंडओवर नहीं किया गया है। उनके अनुसार, इसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सौंपा गया था और उनके मुताबिक यह शुरू से ही संचालित नहीं हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्लांट के संचालन की जिम्मेदारी उनके पास नहीं है।
सीएमएस के इस बयान के बाद प्लांट के हस्तांतरण, संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। सार्वजनिक धन से स्थापित इस सुविधा का उपयोग मरीजों के हित में सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभागों की भूमिका सामने आनी चाहिए।
तकनीकी जांच और रखरखाव की स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत
ऑक्सीजन प्लांटों के रखरखाव, तकनीकी व्यवस्था और इस्तेमाल होने वाले रसायनों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इन बिंदुओं की पुष्टि के लिए तकनीकी निरीक्षण, रखरखाव के अभिलेखों और संबंधित विभागों की रिपोर्ट की जांच जरूरी है।
यह स्पष्ट होना चाहिए कि दोनों प्लांटों की मौजूदा स्थिति क्या है, उनकी नियमित तकनीकी जांच कब होती है और किसी खराबी या आपात स्थिति में मरीजों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या है।
मरीजों की सुरक्षा के लिए जवाबदेही जरूरी
जिला अस्पताल में अस्थमा, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए समय पर ऑक्सीजन उपलब्ध होना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में प्लांटों के संचालन, तकनीकी निगरानी और नियमित रखरखाव की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को दोनों ऑक्सीजन प्लांटों की तकनीकी जांच कराकर उनकी कार्यशीलता, ऑपरेटर की नियुक्ति, रखरखाव की जिम्मेदारी और वैकल्पिक ऑक्सीजन व्यवस्था के बारे में स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी इस महत्वपूर्ण व्यवस्था को लेकर किसी तरह की अनिश्चितता न रहे।















