सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में चलती बस के अंदर 16 वर्षीय लड़की के साथ हुए कथित सामूहिक बलात्कार का स्वतः संज्ञान लेते हुए सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं जताईं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाएं बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में कानून प्रवर्तन और सार्वजनिक प्रशासनिक अधिकारियों की व्यवस्थित विफलता की ओर इशारा करती हैं। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा और कहा कि पार्क, बस और सड़कें जैसी जगहों को “उच्च जोखिम वाले क्षेत्र” बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और के विनोद चंद्रन की पीठ ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में नाबालिगों के साथ यौन हिंसा की कई हालिया घटनाओं को उजागर करने वाली मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लिया। अदालत द्वारा संदर्भित मामलों में लेडी श्री राम कॉलेज के पास आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित बलात्कार, स्वरूप नगर में एक नाबालिग के साथ कथित सामूहिक बलात्कार और ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जा रही बस के अंदर एक अन्य नाबालिग के साथ कथित यौन उत्पीड़न शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इसकी तुलना 2012 के निर्भया मामले से की
सुनवाई के दौरान, पीठ ने यौन उत्पीड़न के मामलों की पुनरावृत्ति पर चिंता व्यक्त की और सवाल उठाया कि क्या 2012 के निर्भया मामले से वाकई सबक सीखा गया है। अदालत ने कहा, “2012 के निर्भया मामले से तुलना करना और यह सोचना स्वाभाविक है कि क्या इससे सबक सीखा गया है। सार्वजनिक सुरक्षा की गारंटी के बावजूद एनसीआर में यौन उत्पीड़न की घटनाएं हो रही हैं। हिंसा से मुक्त गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक गारंटी है।
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