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1974 का खुटहन विधानसभा चुनाव : कांग्रेस की लहर, किसान राजनीति और बंटे विपक्ष के बीच लक्ष्मी शंकर यादव की जीत

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खुटहन/जौनपुर। वर्ष 1974 का विधानसभा चुनाव तत्कालीन खुटहन विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। यह वह दौर था जब देश और उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव कायम था, लेकिन चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में किसान राजनीति भी तेजी से उभर रही थी। ऐसे माहौल में कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मी शंकर यादव ने 32,452 वोट (46.46 प्रतिशत) प्राप्त कर जीत हासिल की थी।

कांग्रेस बनाम किसान राजनीति

1974 के चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) से थी। चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली बीकेडी किसानों और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी। पार्टी के उम्मीदवार ईश नारायण को 25,757 वोट (36.87 प्रतिशत) मिले। हालांकि, कांग्रेस विरोधी मतों का पूरी तरह एकजुट न हो पाना लक्ष्मी शंकर यादव के लिए लाभकारी साबित हुआ।

यादव समाज में कांग्रेस की मजबूत पकड़

उस समय पूर्वांचल की राजनीति में जातीय समीकरण आज की तरह स्पष्ट नहीं थे। यादव समाज का बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ था और लक्ष्मी शंकर यादव को इसका लाभ मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की संगठनात्मक शक्ति और स्थानीय नेतृत्व की पकड़ भी मजबूत मानी जाती थी।

विपक्ष का बिखराव बना कांग्रेस की ताकत

1974 के चुनाव में कई निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे दलों के मैदान में उतरने से विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ। दया शंकर, बाबू नंदन, दिनेश कांत दुबे और अन्य प्रत्याशियों ने भी हजारों वोट हासिल किए। इसका सीधा फायदा कांग्रेस प्रत्याशी को मिला और मुकाबला द्विध्रुवीय होने के बजाय बहुकोणीय बन गया।

इमरजेंसी से पहले का राजनीतिक माहौल

1974 का चुनाव उस समय हुआ था, जब देश में आर्थिक संकट, महंगाई और छात्र आंदोलनों का माहौल बन रहा था। हालांकि, आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा अभी नहीं हुई थी और कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ा था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रभाव अभी भी कायम था।

खुटहन में बदलती राजनीति की शुरुआत

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 1974 का चुनाव खुटहन क्षेत्र में बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी था। भारतीय क्रांति दल का मजबूत प्रदर्शन यह दर्शाता था कि आने वाले वर्षों में किसान और पिछड़ा वर्ग आधारित राजनीति का प्रभाव बढ़ने वाला है। बाद के दशकों में यही राजनीति जनता दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों के उभार का आधार बनी।

1974 के चुनाव का संदेश

कांग्रेस अभी भी सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति थी।

चौधरी चरण सिंह की किसान राजनीति पूर्वांचल में पैर पसार रही थी।

विपक्ष का बिखराव कांग्रेस की जीत का बड़ा कारण बना।

जातीय राजनीति का प्रभाव सीमित था, जबकि स्थानीय नेतृत्व और पार्टी संगठन अधिक महत्वपूर्ण थे।

यही दौर आगे चलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलावों की नींव साबित हुआ।

निष्कर्ष

1974 का खुटहन विधानसभा चुनाव केवल एक चुनाव नहीं था, बल्कि वह दौर था जब कांग्रेस का प्रभुत्व बरकरार था और दूसरी ओर किसान एवं पिछड़ा वर्ग की राजनीति धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी। यही संघर्ष आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।

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नीरज यादव स्वतंत्र आवाज़ न्यूज़ के संस्थापक , संपादक हैं । वह डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म आवाज़ न्यूज़ के लिए निष्पक्ष और जमीर वाली पत्रकारिता के सृजन में अपना सहयोग कर रहे हैं ।