पीपल की छाँव वाली चौपाल अब मोबाइल की स्क्रीन हो गई।
दादा की कहानियाँ अब यूट्यूब की रील हो गईं।।
पहले सुबह-सुबह मंदिर की घंटी बजती थी।
अब अलार्म टोन से दिन की शुरुआत होती है।।
छत पर पतंग उड़ाने वाले हाथ अब गेम कंट्रोलर थामते हैं।
आँगन की किलकारियाँ अब वॉइस नोट में कैद रहती हैं।।
संस्कार बदले हैं, मगर मरे नहीं हैं।
दीये की जगह एलईडी आ गई, पर रोशनी वही है।
छुआछूत की दीवारें गिरीं, रिश्तों की खिड़कियाँ खुलीं।।
पहले गुरु के पैर छूते थे, आज उन्हें मैसेज फॉरवर्ड करते हैं।
श्रद्धा का पता बदल गया है, भाव नहीं।।
बदलते संस्कारों को मत कोस, बस परख ले तू।
जो जड़ था वो टूट गया, जो रूह थी वो बच गई।।
नई पीढ़ी नए रास्ते जरूर बनाएगी।
“नमस्ते”में जो अपनत्व था,वो संस्कार सिखाएगी।।
गुरु प्रसाद विश्वकर्मा
शिक्षाविद/साहित्यकार/पत्रकार






