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समाप्ति कि ओर इन्सानियत

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ऐ समीर! मुझे खुद की तरह आँवारा बना दो,
नफ़रत की सरहद के उस पार पहुँचा दो,
जो ढंक चुकी जमीन ईर्ष्या की रेत से,
उस रेत को उड़ा कर समुद्र में पहुँचा दो।

ऐ दिवाकर! मुझे आग का गोला बना दो,
ढंक चुकी धरती साम्प्रदायिकता की ठंडी बर्फ से,
उसे भ्रातृत्व की गर्माहट से पिघला कर बादल बना दो,
सींच कर उस जल से धरा को, प्रेम का बीज पनपा दो।

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ऐ गिरिराज! मुझे सदानीरा बना दो,
जल रही यह धरती पापाचार की आग से,
इसे अपनी कलकल धारा का स्पर्श करा दो,
शीतल करके, इसकी ममत्व को लौटा दो।

ऐ गगन! मुझे अपनी बिजली ही बना लो,
फँस चुकी यह धरती अज्ञानता के प्रभाव में,
चमका कर इस पर अपनी तीक्ष्ण बिजली,
इसको पुनः ज्ञान से प्रकाशमान बना दो।

ऐ क्षितिज! मुझे खुद की तरह विस्तारवान बना दो,
सीमट चुकी यह धरती अहम की छद्म तुंगता से,
इसके कण-कण में विनम्रता का संचार करा कर ,
इसको अवनमित होने का रहस्य समझा दो।

ऐ वृक्षराज!मुझे अपनी पल्लव बना लो,
घूँट रही यह धरती मानसिक प्रदूषण से,
देकर इसे सत्कर्मों का आक्सीजन,
इसको विलुप्त होने से बचा लो।

ऐ ईश्वर! मुझे एक इंसान बना दो,
श्रृंगारहीन हो रही यह धरती इंसानियत के अभाव में,
इसकी माँग को मानवता की सिंदूर से सजा दो,
कहता है “गुरुदेव” धरा को विधवा होने से बचा लो।।

गुरु प्रसाद विश्वकर्मा ‘गुरूदेव’

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