Home जौनपुर ट्रिब्यूनल जज ने कोर्ट की अवमानना पर लिया कड़ा एक्शन

ट्रिब्यूनल जज ने कोर्ट की अवमानना पर लिया कड़ा एक्शन

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​वकील के बेटे को टक्कर मारने वाले ऑटो का हुआ था बीमा, 2 महीने में देना था हर्जाना
​जौनपुर-अदालत के आदेश को हल्के में लेना एक जानी-मानी बीमा कंपनी को भारी पड़ गया है। सड़क हादसे के शिकार एक होनहार छात्र को मुआवजा न देकर मनमानी करने वाली नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के जज मनोज कुमार अग्रवाल ने कड़ा फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी के खिलाफ कलेक्टर के माध्यम से 13 लाख रुपये की रिकवरी सार्टिफिकेट (आरसी) जारी कर दी है। कोर्ट के इस कड़े तेवर से बीमा महकमे में हड़कंप मच गया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 मई की तारीख तय की गई है।
​क्या है पूरा मामला?
​मामला बक्सा थाना क्षेत्र के शंभूगंज बाजार का है। दीवानी न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष उपाध्याय (निवासी सवंसा, बक्सा) का बेटा चक्रवर्ती प्रभाकर उपाध्याय चार साल पहले कक्षा 11वीं का छात्र था। वह साइकिल से बाजार जा रहा था, तभी एक बेकाबू ऑटो रिक्शा ने उसे जोरदार टक्कर मार दी। इस भयानक हादसे में चक्रवर्ती गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके बाद वाराणसी के बीएचयू (BHU) ट्रॉमा सेंटर में उसका लंबा इलाज चला।
​कोर्ट के आदेश को भी ठेंगे पर रखा
​न्याय की आस में पीड़ित परिवार ने ऑटो मालिक संतोष उपाध्याय, चालक प्रेम शंकर उपाध्याय और बीमा कंपनी (नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) के खिलाफ ट्रिब्यूनल में अधिवक्ता हिमांशु श्रीवास्तव के माध्यम से क्षतिपूर्ति का मुकदमा दायर किया था।
​अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि हादसा ऑटो चालक की घोर लापरवाही और उपेक्षा के कारण हुआ था। चूंकि ऑटो का बीमा था, इसलिए कोर्ट ने 24 दिसंबर 2025 को बीमा कंपनी को आदेश दिया था कि वह पीड़ित को ब्याज सहित ₹13 लाख की क्षतिपूर्ति राशि 2 महीने के भीतर अदा करे।
​जब नोटिस का भी नहीं हुआ असर, तो चला कोर्ट का ‘चाबुक’
​बीमा कंपनी ने कोर्ट की समय सीमा (2 महीने) बीत जाने के बाद भी फूटी कौड़ी नहीं चुकाई। कंपनी के इस अड़ियल और संवेदनहीन रवैए के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने कोर्ट में रिकवरी (वसूली) के लिए प्रार्थना पत्र दिया।
​अदालत ने कंपनी को बकाए की नोटिस भी जारी की, लेकिन जब रसूखदार कंपनी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, तो ट्रिब्यूनल जज ने कानूनी चाबुक चलाते हुए सीधे कलेक्टर के जरिए आरसी (RC) जारी कर दी। अब प्रशासन इस रकम की वसूली कंपनी से कड़ाई से करेगा।
​धारदार पंच (Impact Points):
​आम आदमी की जीत: यह फैसला उन कंपनियों के मुंह पर तमाचा है जो प्रीमियम तो समय पर वसूलती हैं, लेकिन क्लेम देने के वक्त पीड़ितों को अदालतों के चक्कर कटवाती हैं।
​अधिवक्ता पुत्र को न्याय: चार साल के लंबे इंतजार और दर्द के बाद आखिरकार कानून ने पीड़ित छात्र और उसके अधिवक्ता पिता के हक में बड़ा फैसला सुनाया।
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नीरज यादव स्वतंत्र आवाज़ न्यूज़ के संस्थापक , संपादक हैं । वह डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म आवाज़ न्यूज़ के लिए निष्पक्ष और जमीर वाली पत्रकारिता के सृजन में अपना सहयोग कर रहे हैं ।

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