एक अहम कानूनी घटनाक्रम में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन 15 जनहित याचिकाओं (पीआईएल) के समूह को खारिज कर दिया है, जिनमें 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से पहले कथित भड़काऊ भाषण देने वाले कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने की मांग की गई थी। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही पिछले छह साल से अधिक समय से उच्च न्यायालय में लंबित एक लंबी और जटिल कानूनी लड़ाई का नाटकीय अंत हो गया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एक संक्षिप्त सुनवाई के दौरान इन सभी याचिकाओं का एकमुश्त निपटारा कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का विस्तृत और तर्कसंगत लिखित आदेश बाद में जारी किया जाएगा। खारिज की गई इन याचिकाओं का दायरा केवल राजनीतिक नेताओं के भाषणों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इनमें चल रही जांच प्रक्रियाओं में व्यापक बदलाव की भी मांग की गई थी।
इन याचिकाओं के माध्यम से सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के आरोपी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करने की अपील की गई थी। इसके साथ ही, याचिकाकर्ताओं ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मूल कारणों और उसकी साजिश की गहराई से जांच करने के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा स्वतंत्र जांच कराने की भी पुरजोर मांग की थी।
इतना ही नहीं, इन याचिकाओं में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिसंबर 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया परिसर में भड़की हिंसा की एक अलग जांच की भी रूपरेखा तैयार करने को कहा गया था, और उन पुलिस कर्मियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी जिन पर हफ्तों तक चली इस अशांति के दौरान ड्यूटी में लापरवाही बरतने या उपद्रवियों के साथ मिलीभगत करने के आरोप लगे थे।
इन याचिकाओं की पृष्ठभूमि 2020 की शुरुआत में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए उन भीषण सांप्रदायिक दंगों से जुड़ी है, जिनमें 53 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी और सैकड़ों अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हिंसा के तुरंत बाद दायर की गई इन याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि हिंसा शुरू होने से कुछ दिन पहले राजनीतिक हस्तियों द्वारा दिए गए अत्यधिक भड़काऊ और सांप्रदायिक भाषणों ने ही इन दंगों को भड़काने में एक उत्प्रेरक का काम किया था।
पिछले कई वर्षों के दौरान, इस मामले में सुनवाई के कई लंबे दौर चले। इस बीच कई बार न्यायिक पीठों में बदलाव हुए और अभद्र भाषा (हेट स्पीच) की सटीक कानूनी परिभाषा तथा जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए आवश्यक सबूतों के आधार को लेकर अदालत कक्ष में तीखी और लंबी बहसें देखने को मिलीं।
आखिरकार, इन याचिकाओं को खारिज करके उच्च न्यायालय ने पुलिस को कोई नया निर्देश देने या इन विशिष्ट आरोपों की जांच के लिए कोई नया स्वतंत्र जांच निकाय (एसआईटी) स्थापित करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत द्वारा अपना विस्तृत लिखित आदेश आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए जाने के बाद ही इस बड़े फैसले के पीछे का पूरा कानूनी और तार्किक आधार सार्वजनिक हो सकेगा।
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