_शिक्षक राष्ट्र का भाग्य विधाता होता है। वह न केवल विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान देता है, बल्कि उनके चरित्र का निर्माण भी करता है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके नागरिकों की योग्यता पर निर्भर करती है और उन नागरिकों को योग्य बनाने का कार्य एक शिक्षक ही करता है। इसलिए *चाणक्य ने कहा था— “प्रलय और निर्माण शिक्षक की गोद में पलते हैं।”*_
_चरित्र निर्माण और नैतिक मूल्यों का विकास:एक विकसित राष्ट्र के लिए नागरिकों का चरित्रवान होना आवश्यक है। शिक्षक बच्चों में ईमानदारी, अनुशासन, देशभक्ति, और संवेदनशीलता जैसे मानवीय गुणों का बीजारोपण करते हैं। वे विद्यार्थियों को सही और गलत का अंतर समझाकर समाज को सही दिशा देते हैं।_
_ज्ञान और कौशल का विकास: आधुनिक युग विज्ञान और तकनीकी का युग है। शिक्षक विद्यार्थियों को नवीन ज्ञान और कौशल (Skills) से कुशल बनाते हैं। देश के भावी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, और प्रशासनिक अधिकारी शिक्षक की पाठशाला से ही तैयार होकर राष्ट्र सेवा में योगदान देते हैं।_
_सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन:शिक्षक समाज से अज्ञानता, अंधविश्वास, और जातिवाद जैसी बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) पैदा करते हैं, जिससे एक प्रगतिशील समाज का निर्माण होता है।_
_*उपसंहार:*_
_शिक्षक राष्ट्र निर्माण की वह नींव है, जिसके बिना एक सुदृढ़ और समृद्ध देश की कल्पना नहीं की जा सकती। शिक्षक का कार्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है। अतः राष्ट्र के विकास के लिए शिक्षकों का सम्मान और उनकी गरिमा की रक्षा करना पूरे समाज का कर्तव्य है।_
राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका
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