सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर में चंदे के कथित गबन की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) के पुनर्गठन का सुझाव दिया और कहा कि वह इस तरह के मामलों को संभालने का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी द्वारा जांच किए जाने को प्राथमिकता देगा। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि पहले गठित एसआईटी को प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का कार्य सौंपा गया था। इसलिए, पीठ ने कहा कि पूर्ण जांच के लिए एक अलग एसआईटी का गठन किया जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि एसआईटी का गठन “सच्चाई का पता लगाने” के लिए किया गया था और जांच में पाया गया कि “संज्ञेय अपराध है”। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि लखनऊ के पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) और दो वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी एसआईटी का हिस्सा थे, और पूछा कि क्या वे निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य जांच कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी मोहना सहित पीठ ने मामले का राजनीतिकरण न करने की चेतावनी देते हुए कहा कि यह मामला “अपराध का एक साधारण मामला” है। मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा, “बस एक चेतावनी। कृपया इस मुद्दे का राजनीतिकरण न करें। अदालतें राजनीति का स्थान नहीं हैं… हम यहां केवल उचित जांच सुनिश्चित करने के लिए हैं। फिलहाल अदालत ने इस मामले में अभी तक कोई अंतिम आदेश या निर्देश पारित नहीं किया है और वह 27 जुलाई को इस मामले की फिर से सुनवाई करेगी।
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