बदलापुर/जौनपुर। शिक्षक का दायरा केवल विद्यालय, ब्लैकबोर्ड और किताबों तक सीमित नहीं होता। एक शिक्षक विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण के साथ-साथ उनके सपनों को दिशा देने और उन्हें बेहतर नागरिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षक के इसी व्यापक स्वरूप को लेकर डॉ. अंजना सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, जौनपुर ने अपने विचार साझा किए।
डॉ. अंजना सिंह का कहना है कि जीवन में सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। माता-पिता, भाई-बहन, गुरु और अनुभवी लोगों से हमें जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जीवन में जो भी व्यक्ति हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, वह किसी न किसी रूप में हमारा शिक्षक ही होता है।
उन्होंने कहा कि जिंदगी में जब भी कोई काम करें, उसे पूरी निष्ठा और सच्चे मन से करना चाहिए। आधे-अधूरे मन से की गई कोशिशें कभी इतिहास या याद का हिस्सा नहीं बन पातीं। जब कर्म में समर्पण और भावनाएं घुल जाती हैं, तब वह महज काम नहीं रह जाता, बल्कि साधना बन जाता है। शिक्षक का सफर भी ऐसी ही साधना है।
डॉ. अंजना सिंह के अनुसार एक शिक्षक की दुनिया सिर्फ चार दीवारों, ब्लैकबोर्ड और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होती। शिक्षक का हर दिन इस उम्मीद के साथ शुरू होता है कि आज किसी बच्चे के सपने को नई दिशा देनी है। घर की जिम्मेदारियों, निजी परेशानियों और चिंताओं के बावजूद विद्यार्थियों के सामने मुस्कुराते हुए खड़े रहना एक सच्चे शिक्षक की सबसे बड़ी ताकत होती है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं कराता, बल्कि वह विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को आकार देता है। किसी सहमे हुए बच्चे के कंधे पर हाथ रखकर यह कहना कि ‘तुम कर सकते हो’, किसी विद्यार्थी की छोटी-सी सफलता पर स्वयं की जीत जैसा महसूस करना और विद्यार्थियों के बेहतर भविष्य के लिए लगातार तैयारी करते रहना शिक्षक की जिम्मेदारी के साथ-साथ उसके आत्मीय संबंध को भी दर्शाता है।
शिक्षक के जीवन की असली पूंजी उसके विद्यार्थियों की सफलता होती है। वर्षों तक पढ़ाए गए विद्यार्थियों में जब कोई समाज में अपनी पहचान बनाता है तो उसके पीछे शिक्षक की मेहनत और समर्पण की झलक दिखाई देती है। यही वह क्षण होता है जब शिक्षक को अपने वर्षों के परिश्रम की सार्थकता महसूस होती है।
डॉ. अंजना सिंह ने कहा कि दिल से किया गया प्रत्येक कार्य अपनी छाप छोड़ता है। एक शिक्षिका के रूप में उनका प्रयास हमेशा यही रहा है कि विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों, नैतिकता, व्यवहार, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भी शिक्षा मिले।
उन्होंने संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे के माध्यम से गुरु की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा—
‘सब धरती कागद करूं, लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।’
अर्थात पूरी धरती को कागज, जंगल की लकड़ियों को कलम और सातों समुद्रों को स्याही बना दिया जाए, तब भी गुरु के गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि एक अच्छा शिक्षक केवल अच्छे विद्यार्थी नहीं बनाता, बल्कि अच्छे नागरिक और अंततः एक अच्छे राष्ट्र के निर्माण में योगदान देता है। इसलिए शिक्षक की भूमिका समाज और राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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