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क्या याददाश्त और एकाग्रता को प्रभावित कर रहा है ‘ब्रेन फॉग’? समझें इसके कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

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क्या आप कभी किसी कमरे में यह सोचकर दाखिल हुए हैं कि आप वहां क्यों आए थे? या काम की लंबी लिस्ट के बीच एकाग्रता बनाने में भारी संघर्ष करना पड़ा है? कई लोग दिमाग में छाए इस खालीपन या धुंधलेपन को ‘ब्रेन फॉग’ (Brain Fog) कहते हैं। यद्यपि यह शब्द आजकल काफी आम हो गया है, लेकिन डॉक्टर स्पष्ट करते हैं कि यह खुद में कोई स्वतंत्र बीमारी नहीं है।

मुंबई के लीलावती अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र के कंसलटेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. गिरीशकुमार सोनी के अनुसार, ब्रेन फॉग एक ऐसा लक्षण है जिसके पीछे आपकी जीवनशैली की आदतों से लेकर कई न्यूरोलॉजिकल और मेडिकल स्थितियां जिम्मेदार हो सकती हैं। वे सलाह देते हैं कि अगर यह समस्या लगातार बनी रहे, तो इसे सिर्फ व्यस्त दिनचर्या का हिस्सा मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

ब्रेन फॉग क्या है?

डॉ. सोनी के अनुसार, मरीज ब्रेन फॉग को अलग-अलग तरीकों से व्यक्त करते हैं। कुछ लोग भूलने की शिकायत करते हैं, तो कुछ एकाग्रता में कमी, एक साथ कई काम (मल्टीटास्किंग) न कर पाने या स्पष्ट तौर पर न सोच पाने की बात कहते हैं। न्यूरोलॉजी की दृष्टि से ब्रेन फॉग को किसी बीमारी के बजाय दिमागी लक्षणों का एक समूह माना जाता है। इसमें ध्यान केंद्रित न कर पाना, सोचने की प्रक्रिया धीमी होना, मानसिक थकान, भूलने की बीमारी और जानकारी को प्रोसेस करने में कठिनाई होना शामिल है।

ब्रेन फॉग के मुख्य कारण

न्यूरोलॉजिस्ट का कहना है कि ब्रेन फॉग का संबंध अक्सर हमारी आधुनिक जीवनशैली से होता है। नींद की कमी, काम के लंबे घंटे, अत्यधिक तनाव, चिंता, डिप्रेशन, खान-पान की गलत आदतें, डिहाइड्रेशन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय बिताना इसके मुख्य कारण हैं। आज के प्रतिस्पर्धी माहौल में कई युवा इन लक्षणों को सामान्य मान लेते हैं, जबकि यह वास्तव में एक थके हुए और तनावग्रस्त दिमाग का संकेत होता है।

हालांकि, जीवनशैली के अलावा इसके पीछे कई गंभीर चिकित्सीय (Medical) कारण भी हो सकते हैं। यह शरीर में विटामिन बी12 की कमी, थायराइड की समस्या, आयरन की कमी, अनियंत्रित डायबिटीज, क्रॉनिक किडनी या लिवर की बीमारी, ऑटोइम्यून स्थितियों और कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट्स का शुरुआती लक्षण हो सकता है। इसके अलावा, कोविड-19 जैसे वायरल इन्फेक्शन के बाद भी लोगों में लंबे समय तक यह समस्या देखी गई है। न्यूरोलॉजिकल दृष्टिकोण से माइग्रेन, मिर्गी (Epilepsy), मल्टीपल स्केलेरोसिस, नींद के विकार, सिर की चोट और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के शुरुआती चरणों में भी ब्रेन फॉग हो सकता है।

डिमेंशिया और ब्रेन फॉग में अंतर

डॉ. सोनी एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “ब्रेन फॉग का मतलब डिमेंशिया नहीं है।” ब्रेन फॉग से पीड़ित व्यक्ति को इस बात का पूरा अहसास होता है कि उसकी सोचने की क्षमता और याददाश्त प्रभावित हो रही है, जबकि डिमेंशिया के मरीज धीरे-धीरे अपने स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता खो देते हैं और उन्हें अपनी इस स्थिति का भान नहीं रहता।

इलाज और डॉक्टरी सलाह

ब्रेन फॉग के इलाज के लिए डॉक्टर केवल लक्षणों को दबाने के बजाय इसके मूल कारण की पहचान करते हैं। मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, नींद की गुणवत्ता, मानसिक स्थिति और न्यूरोलॉजिकल जांच के जरिए इसका पता लगाया जाता है। मस्तिष्क की इमेजिंग (जैसे एमआरआई) केवल तभी की जाती है जब डॉक्टर को इसकी विशेष आवश्यकता महसूस हो।

मस्तिष्क स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए रोजाना 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लेना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार लेना, पर्याप्त पानी पीना, तनाव कम करना और पढ़ने जैसी मानसिक गतिविधियों में शामिल रहना बहुत जरूरी है।

डॉ. सोनी सलाह देते हैं कि यदि ब्रेन फॉग लगातार बना रहे, समय के साथ बिगड़ता जाए या इसके साथ शरीर में कमजोरी, संतुलन बनाने में परेशानी, बोलने में दिक्कत, आंखों के आगे धुंधलापन, तेज सिरदर्द या दौरे पड़ने जैसे लक्षण दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

(इस लेख में दी गई जानकारी और सुझाव केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। इन्हें किसी पेशेवर चिकित्सा सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।)

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नीरज यादव स्वतंत्र आवाज़ न्यूज़ के संस्थापक , संपादक हैं । वह डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म आवाज़ न्यूज़ के लिए निष्पक्ष और जमीर वाली पत्रकारिता के सृजन में अपना सहयोग कर रहे हैं ।