*-राजेश माहेश्वरी*

चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों द्वारा सत्ता के लालच में लोकलुभावन वादों की झड़ी लगा दी जाती है। यानी जनता के लिए सब ओर मुफ्त की रेवड़ियां तैयार होती हैं। देश के माननीय ये सब सुविधाएं कहां से लायेंगे। ऐसे में विदेशी कर्ज की गठरी लगातार भारी होती जाती है। अर्थव्यवस्था बढ़ते अतिरिक्त व्यय के भार से चरमराने लगती है। हालांकि चुनाव के बाद ज्यादातर वादे फरेब साबित होते हैं। बावजूद मतदाता को इस प्रलोभन में लुभाकर राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपना स्वार्थ साधने में सफल हो जाते हैं। हैं। परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने इन चुनावी रेवडियां बांटे जाने पर गंभीर चिंता जताई है। न्यायालय ने केंद्र सरकार, नीति आयोग, वित्त आयोग, भारतीय रिर्जव बैंक और अन्य सभी हितधारकों को इस गंभीर मसले पर विचार-मंथन करने और रचनात्मक सुझाव देने का आग्रह किया है। साथ ही एक विशेषज्ञ निकाय बनाने का निर्देश भी दिया है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुफ्त के इन उपहारों पर लगातार चिंता जता रहे हैं। इसी का परिणाम है कि भारतीय जनता पार्टी ने यह फैसला लिया है कि आने वाले चुनावों में वह अपने घोषणा-पत्र में मुफ्त में दिए जाने वाले उपहारों का वादा नहीं करेगी। उसके नेता भाषणों में भी चुनावी रेवडियां बांटने की बात नहीं करेंगे। अब तक ये लोक-लुभावन वादे भाजपा समेत सभी दल जन कल्याणकारी योजनाओं के बहाने करके, जीतने पर अमल में लाते रहे हैं। हालांकि 70 प्रतिशत वादे पूरे नहीं हो पाते हैं।

 

प्रधान न्यायाधीश एनवी रमणा, कृष्ण मुरारी और हिमा कोहली की पीठ ने इस मुद्दे के समाधान के लिए केंद्र सरकार को उपाय सुझाने हेतु एक विषेशज्ञ पैनल गठित करने का भी निर्देश दिया है। यह न्यायालय भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। उपाध्याय ने राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए दिए जाने वाले उपहारों की घोषणाओं पर प्रतिबंध लगाने और ऐसे दलों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।

 

पीठ ने कहा है कि यह गंभीर मुद्दा है और चुनाव आयोग या सरकार यह नहीं कह सकते हैं कि वे इसमें कुछ नहीं कर सकते। केंद्र सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता तुशार मेहता ने कहा कि ‘सैद्धांतिक रूप से याचिकाकर्ता की दलीलों का समर्थन करते हैं। इन लोक-लुभावन वादों के दो तरह के प्रभाव देखने में आते हैं। एक तो ये मतदाताओं के निष्पक्ष निर्णय को प्रभावित करते हैं और दूसरे, इन्हें पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। अतएव इस पर चुनाव आयोग से भी सुझाव लिए जाने चाहिए।

 

फिलहाल न्यायालय ने आयोग को शामिल नहीं किया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब चुनाव नीतियों और कार्यक्रम की बजाय प्रलोभनों का फंडा उछालकर लड़े जाने लगे हैं। राजनेताओं की दानवीर कर्ण की यह भूमिका स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ों में मट्ठा घोलने का काम कर रही है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए मतदाता को बरगलाना आदर्श चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाने जैसा है। सही मायनों में वादों की घूस से निर्वाचन प्रक्रिया दूषित होती है, इसलिए इस घूसखोरी को आदर्श आचार संहिता के दायरे में लाना जरूरी है।

 

वैसे भी इन वादों की हकीकत जमीन पर उतरी होती तो पंजाब में 7000 किसानों ने आत्महत्या न की होती, क्योंकि पंजाब में किसान कल्याण के सबसे ज्यादा वादे अकाली दल ने सरकार में रहते हुए किए थे। अफलातूनी वादों के उलट हकीकत में अब ज्यादा जरूरत शासन प्रशासन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है। यह वादा ज्यादातर राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र से हमेशा गायब रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कई घोषणाएं की, लेकिन अब मुफ्त की घोषणाओं के कारण वहां कर्ज बढ़ता जा रहा है।

रेवड़ी कल्चर से कैसे देश के राज्य कर्ज में डूबते जा रहे हैं। हाल ही में पंजाब सरकार ने हर परिवार को हर महीने 300 यूनिट फ्री बिजली और हर वयस्क महिला को हर महीने 1 हजार रुपये देने की योजना शुरू की है। इन दोनों योजनाओं पर 17 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। लिहाजा, 2022-23 में पंजाब का कर्ज 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होने का का अनुमान है। आरबीआई ने चेताया है कि अगर खर्च और कर्ज का प्रबंधन सही तरह से नहीं किया तो स्थिति भयावह हो सकती है। ‘स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिस’ नाम से आई आरबीआई की इस रिपोर्ट में उन पांच राज्यों के नाम दिए गए हैं, जिनकी स्थिति बिगड़ रही है। इनमें पंजाब, राजस्थान, बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल है।

 

आरबीआई ने अपनी इस रिपोर्ट में ‘कैग’ के आंकड़ों के हवाले से बताया है कि राज्य सरकारों का सब्सिडी पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। 2020-21 में सब्सिडी पर कुल खर्च का 11.2 फीसदी खर्च किया था, जबकि 2021-22 में 12.9 फीसदी खर्च किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, सब्सिडी पर सबसे ज्यादा खर्च झारखंड, केरल, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में बढ़ा है। गुजरात, पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकार ने अपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर का 10 फीसदी से ज्यादा खर्च सब्सिडी पर किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त ही दे रहीं हैं। सरकारें ऐसी जगह पैसा खर्च कर रहीं हैं, जहां से उन्हें कोई कमाई नहीं हो रही है। फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री यात्रा, बिल माफी और कर्ज माफी, ये सब ‘फ्रीबाईस’ हैं, जिन पर राज्य सरकारें खर्च कर रहीं हैं।

 

भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि 2021-22 से 2026-27 के बीच कई राज्यों के कर्ज में कमी आने की उम्मीद है. राज्यों की ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीएसडीपी) में कर्ज की हिस्सेदारी घट सकती है। गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक और ओडिशा की सरकारों का कर्ज घटने का अनुमान है। हालांकि, कुछ राज्य ऐसे भी जिनका कर्ज 2026-27 तक जीएसडीपी का 30 फीसदी से ज्यादा हो सकता है। इनमें पंजाब की हालत सबसे खराब होगी। उस समय तक पंजाब सरकार पर जीएसडीपी का जीएवडीपी का 45 फीसदी से ज्यादा कर्ज हो सकता है। वहीं, राजस्थान, केरल और पश्चिम बंगाल का कर्ज ळैक्च् के 35 फीसदी तक होने की संभावना है।

 

राजनीतिक दलों द्वारा वोटों के धुव्रीकरण के लिए मुफ्त सेवाएं देने की योजनाएं बनाना राष्ट्र को पराभव की ओर धकेलने के समान है। इस मामले में कोई भी दल एक-दूसरे पर उंगली उठाने लायक नहीं है। हमाम में सब एक जैसे हैं। ऐसी योजनाओं से लोगों में अकर्मण्यता पैदा होती है। सामाजिक विद्वेष बढ़ता है। वित्तीय संतुलन डगमगाने लगता है। जिन्हें इस तरह की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता वे भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मुफ्त में सौगात बांटना, राष्ट्र के विकास के लिए अवरोध उत्पन्न करना है। मुफ्त की योजनाओं की घोषणाएं पूरी करने के लिए सरकार को करदाताओं पर अतिरिक्त भार डालना पड़ता है। जिसके कारण कर्मठ, अनुशासन प्रिय, कर्तव्यनिष्ठ राष्ट्रभक्त लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसकी कीमत राष्ट्र को किसी न किसी रूप में चुकानी पड़ती है।

 

मुफ्त की सौगातें देने की बजाय सरकारें जनता को रोजगार, महंगाई से राहत, बिजली-पानी का उचित प्रबंध करें। केवल शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं ही मुफ्त हों बाकी मुफ्त की चीजें इंसान को निकम्मा बना देती हैं। सरकार को मुफ्त की योजनाएं वास्तव में असहाय, विकलांग, जरूरतमंद लोगों के लिए ही बनानी चाहिए, जिससे सरकार को राष्ट्र के विकास की गति में वित्तीय संकट का सामना न करना पड़े।

उच्चतम न्यायालय ऐसी योजनाओं पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाए। श्रीलंका का ताजा उदाहरण हमारे सामने है। जनता को पंगु बनाने से अच्छा है कि उन्हें स्वाभिमान के साथ जीने के अवसर दिये जायें। निहित स्वार्थ त्यागकर देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये।

 

*-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

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